भारत की विकेन्द्रीय सरकारी व्यवस्था में ग्राम सभा की एक अहम भूमिका है। यह 1992 के 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के तहत बताई गई जमीनी लोकतंत्र की नींव है। 1993 का मध्य प्रदेश पंचायत राज और ग्राम स्वराज अधिनियम ग्राम सभा को कानूनी अधिकार और जिम्मेदारियां देता है, जिससे यह संवैधानिक आदेश हकीकत बनता है। यह रिसर्च पेपर इस अधिनियम के तहत ग्राम सभा की कानूनी और संवैधानिक स्थिति का आलोचनात्मक और व्यावहारिक मूल्यांकन करता है। यह जांच करता है कि कानून के इरादे के अनुसार जमीनी स्तर पर शासन कितनी प्रभावी ढंग से किया गया यह स्टडी मध्य प्रदेश की ग्राम सभाओं की असल गतिविधियों के साथ-साथ उनके संस्थागत ढांचे और कानूनी नियमों की जांच करती है। यह प्रशासनिक सीमाओं, खराब सार्वजनिक भागीदारी, अज्ञानता और नौकरशाही के दबदबे जैसे मुद्दों पर भी ध्यान दिलाती है। यह स्टडी सैद्धांतिक और विश्लेषणात्मक तरीकों का इस्तेमाल करके यह मूल्यांकन करती है कि क्या ग्राम सभा अभी भी सिर्फ एक प्रतीकात्मक संस्था है या असल में स्व-शासन की संस्था के रूप में विकसित हुई है। स्टडी इस नतीजे पर पहुँचती है कि, कानूनी ढांचे के प्रगतिशील स्वभाव के बावजूद, बेहतर कार्यान्वयन, जवाबदेही प्रणालियों और नागरिक सशक्तिकरण के बिना विकेंद्रीकरण सफल नहीं हो सकता।
Shukla et al. (Thu,) studied this question.