इक्कीसवीं सदी का वैश्विक परिदृश्य बहुआयामी परिवर्तनों से पर्याप्त मात्रा में प्रभावित दृष्टिगोचर होता है। विचारणीय है कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं तकनीकी स्तर पर तीव्र गति के साथ परिवर्तन परिलक्षित हो रहा है। नई अर्थव्यवस्था के प्राणवायू के रूप में भाषा का अनन्यसाधारण महत्त्व स्पष्ट रूप में उजागर हो रहा है।भाषा केवल संप्रेषण एवं संवाद का माध्यम न रहकर वह आर्थिक संसाधन, सांस्कृतिक पूँजी और सामाजिक सशक्तीकरण के मुख्य साधन के रूप में स्वयं का अस्तित्व सिद्ध कर रही है। कहना गलत न होगा कि नई अर्थव्यवस्था को समृद्ध एवं सुदृढ़ बनाने में भाषा की भूमिका रीढ़ की हड्डी की तरह दायित्व वहन करती हुई परिलक्षित होती है।प्रस्तुत शोधालेख में वैश्वीकरण के संदर्भ में नई अर्थव्यवस्था की प्रकृति, नई अर्थव्यवस्था को उन्नत बनाने में स्थानीय भाषाओँ की भागीदारी एवं आर्थिक समावेशन, डिजिटल भागीदारी, नवाचार एवं ज्ञान विस्तार और सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा, भारतीय स्थानीय भाषाएँ, भाषा प्रयोग एवं चुनौतियाँ तथा संभावनाएँ आदि को केंद्र में रखा है। निष्कर्ष एवं तथ्य रूप कहा जा सकता है कि विकास की प्रक्रिया को जनोन्मुख एवं शाश्वत बनाने की दृष्टि से स्थानीय भाषाओं को नई अर्थव्यवस्था की केंद्रीय धारा में स्थान देना आवश्यक प्रतीत होता है।
Dr. Bhausaheb N. Navale (Sun,) studied this question.