यह शोधपत्र भारत के राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (Nhrc) का विश्लेषण एक ऐसे विधायी संस्थान के रूप में करता है, जो भारतीय संविधान के अंतर्गत किए गए अधिकारों की गारंटियों को मानवाधिकार संरक्षण के वास्तविक संचालन से जोड़ता है, विशेष रूप से एक लोकतंत्र के रूप में देश के निरंतर अनुभव के संदर्भ में। एन.एच.आर.सी की स्थापना मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के परिणामस्वरूप की गई थी। एनएचआरसी की स्थापना इस बात का संकेत है कि भारत केवल न्यायालयों तक सीमित न रहकर एक संस्थागत तंत्र के माध्यम से मानवाधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यद्यपि एन.एच.आर.सी ने नागरिकों को मानवाधिकार संरक्षण प्रदान करने हेतु एक संस्थागत ढांचा विकसित किया है और सरकारी प्राधिकरणों की जवाबदेही को सुदृढ़ करने तथा उसकी निगरानी करके लोकतंत्र की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, फिर भी इसकी प्रभावशीलता कई कारणों से सीमित हो जाती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि एन.एच.आर.सी को संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है, यह कार्यपालिका द्वारा प्रदान की जाने वाली नियुक्तियों और संसाधनों पर अत्यधिक निर्भर करता है, तथा इसके पास बाध्यकारी प्रवर्तन शक्तियों के बजाय मुख्यतः अनुशंसात्मक प्रवर्तन शक्तियाँ हैं। परिणामस्वरूप, संविधान के आदर्शों और उन सिद्धांतों के व्यावहारिक क्रियान्वयन के बीच एक अंतर बना रहता है। इस शोधपत्र का निष्कर्ष एन.एच.आर.सी की स्वतंत्रता, प्रवर्तनीयता और वैधता में सुधार हेतु स्पष्ट रूप से व्यक्त और औचित्यपूर्ण सिफारिशें प्रस्तुत करता है, ताकि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों और भारत की व्यापक संवैधानिक दृष्टि के प्रति एन.एच.आर.सी की प्रतिबद्धताओं को प्रतिबिंबित कर सके।
DR.MANOJ KUMAR (Thu,) studied this question.