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परोपकार-खुद के लिए कीमत पर समूह के सदस्यों को लाभ पहुँचाना-और पारोचियलिज़्म-अपने जातीय, नस्लीय या अन्य समूह से न नहीं रहने वाले व्यक्तियों के प्रति शत्रुता-मानव व्यवहार के सामान्य लक्षण हैं। दोनों का संगम-जिसे हम "पारोचियल परोपकार" कहते हैं-एक विकासात्मक दृष्टिकोण से गुत्थी में है क्योंकि परोपकारी या पारोचियल व्यवहार व्यक्ति की लाभ को कम करता है जबकि इसकी तुलना में ऐसे व्यवहारों से परहेज करने पर उसे क्या हासिल होगा। लेकिन यदि पारोचियलिज़्म ने अंतर्गुट शत्रुताओं को बढ़ावा दिया और परोपकार और पारोचियलिज़्म का संयोजन इन संघर्षों में सफलता में योगदान दिया, तो पारोचियल परोपकार विकसित हो सकता था। हमारा गेम-थ्योरिटिक विश्लेषण और एजेंट-आधारित सिमुलेशन दिखाते हैं कि अगर मानवों ने अंतिम प्लेओस्तीन और प्रारंभिक होलोसीन के द्वारा अनुभव किए गए हालात में, तो न ही पारोचियलिज़्म और न ही परोपकार अकेले टिकाऊ होते, लेकिन समूह संघर्ष को बढ़ावा देकर, वे सामूहिक रूप से विकसित हो सकते थे।
चोई एट अल. (गुरुवार,) ने इस प्रश्न का अध्ययन किया।
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