प्रस्तुत शोध पत्र 18वीं शताब्दी के मध्य रोहिलखण्ड क्षेत्र में घटित स्थापत्य रूपांतरण की प्रक्रियाओं का ऐतिहासिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में बहुआयामी विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह अध्ययन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि किस प्रकार रोहिला शासकों की रक्षात्मक और इस्लामी स्थापत्य कला, ब्रिटिश शासन के आगमन के पश्चात उपयोगितावादी और \\\'इण्डो-सारसैनिक\\\' शैली में परिवर्तित हुई। यह संक्रमण मात्र निर्माण सामग्री का परिवर्तन नहीं, बल्कि सत्ता की प्रकृति में आए बदलाव का भौतिक प्रतिबिम्ब है। इस अध्ययन के माध्यम से मुगलोत्तर काल में विकसित स्थापत्य शैलियों के अन्तर्गत स्थानीय परंपराओं, इस्लामी वास्तु तत्वों तथा औपनिवेशिक प्रभावों के पारस्परिक अंतर्संबंधों को समझने का प्रयास किया गया है। रोहिलखण्ड की स्थापत्य परंपरा केवल सौंदर्यात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह तत्कालीन सत्ता संरचनाओं, धार्मिक विचारधाराओं, सामाजिक संरचनाओं तथा आर्थिक गतिविधियों की मूर्त अभिव्यक्ति के रूप में विकसित हुई। शोध में ऐतिहासिक दस्तावेजों, स्थापत्य अवशेषों, क्षेत्रीय सर्वेक्षण, अभिलेखीय स्रोतों तथा तुलनात्मक विश्लेषण पद्धति का उपयोग किया गया है। अंततः यह शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि रोहिलखण्ड का स्थापत्य विकास स्थानीय सांस्कृतिक अस्मिता और वैश्विक आधुनिकता के मध्य सतत संवाद का परिणाम है, जिसने इस क्षेत्र की स्थापत्य विरासत को एक विशिष्ट ऐतिहासिक पहचान प्रदान की।
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राठौर et al. (Thu,) studied this question.
synapsesocial.com/papers/69d894326c1944d70ce0528f — DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19449359
साक्षी राठौर
डॉ० विजय प्रताप सिंह
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