यह लेख समकालीन हिंदी कविता के विस्तृत फलक पर स्त्री विमर्श के सैद्धांतिक एवं व्यवहारिक विकास की समीक्षा करता है। बींसवीं सदी के उत्तरार्ध से लेकर वर्तमान तक हिंदी कविता के पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती देते हुए स्त्री को वस्तुपरकता से मुक्त कर एक सचेतन विमर्श के केंद्र में स्थापित किया।यह शोध स्त्री के आत्म संघर्ष, देह राजनीति, अस्मिता बोध और वर्चस्ववादी सामाजिक सरंचनाओं के विरुद्ध उभरे 'प्रतिरोध के स्वर' का सूक्ष्म विश्लेषण करता है।साथ ही यह अध्ययन रेखांकित करता है कि कैसे समकालीन कविता ने घरेलू हिंसा, श्रम विभाजन और वर्गीय शोषण के विरुद्ध एक सशक्त विमर्श तैयार किया है।
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डॉ. शिवराम सिंह
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डॉ. शिवराम सिंह (Thu,) studied this question.
synapsesocial.com/papers/69d895206c1944d70ce06252 — DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19449135