मुण्डा लोकसंस्कृति में बिरसा मुंडा के संघर्ष और उनकी प्रतिरोध की चेतना को मुंडा लोकसंस्कृति के संदर्भ में विश्लेषित करता है। बिरसा मुंडा, जिन्हें ‘धरती आबा’ के नाम से जाना जाता है, आदिवासी समाज के एक महान नेता थे, जिन्होंने अंग्रेजों और जमींदारी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया। मुंडा लोकसंस्कृति में लोकगीत, कहानियाँ, और धार्मिक विश्वास शामिल हैं। बिरसा मुंडा की प्रतिषोध चेतना को जीवित रखा और आदिवासी समाज में उसकी निरंतर उपस्थिति सुनिश्चित की। लोकगीतों और कथाओं में बिरसा को एक धार्मिक और सामाजिक नायक के रूप में चित्रित किया गया है, जिनकी शिक्षाएँ आज भी आदिवासी समुदाय के जीवन का हिस्सा हैं। उनका संदेश था कि आदिवासी समाज अपनी परंपराओं की रक्षा करे, बाहरी दबावों से मुक्त हो, और अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ा हो। बिरसा के द्वारा प्रस्तुत किया गया प्रतिरोध केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मुक्ति की दिशा में एक आंदोलन था। बिरसा मुंडा की प्रतिरोध चेतना आज भी मुंडा लोकसंस्कृति में एक जीवित धारा के रूप में मौजूद है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आदिवासी समाज को प्रेरित करती है। उनके जीवन और संघर्ष की गाथाएँ लोक साहित्य के माध्यम से आज भी सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव की प्रेरणा देती हैं। यह शोधपत्र मुंडा लोकसंस्कृति के प्रमुख अयामों जैसे- लोकविश्वास, लोककला, लोकगीत, लोककथाएँ, धार्मिक परंपराएँ और सामुदायिक मूल्य में बिरसा मुंडा की चेतना के प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि बिरस मुंडा की विचारधारा ने मुंडा समाज में अस्मिता, आत्मगौरव और सांस्कृतिक एकता की नई लहर उत्पन्न की, जिसने आगे चलकर “उलगुलान” जैसे- ऐतिहासिक जन आंदोलनों को जन्म दिया। यह शोध मुंडा लोकसंस्कृति के पुनरुत्थान को सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में व्याख्यायित करता है, जहाँ बिरसा मुंडा की चेतना एक जीवंत प्रेरक शक्ति के रूप में आज भी प्रासंगिक बनी हुई है।
Kerketta et al. (Sun,) studied this question.