प्रत्येक समाज में यह देखा गया है कि व्यक्ति अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सदैव ही प्रयत्न करता रहता है, उसकी भी निजी एवं पारिवारिक इच्छाएं होती है जिसकी प्राप्ति हेतु वह प्रयत्नशील रहता है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कोई न कोई कार्य करता ही है। (रामटेके 2009 पृ.क्र. 56-57) ने अपने अध्ययन में बताया कि जनजातियों में आर्थिक संगठन का संबंध अपने सीमित संसाधनों के द्वारा अजीविका की मूलभूत आवश्यकता को पूर्ण करने से होता है। जनजातियों के आर्थिक तथा सामाजिक जीवन परस्पर जुड़े होते है, जिसे अलग नहीं किया जा सकता, उनकी प्रत्येक आर्थिक क्रिया सामूहिकता की भावना तथा परंपरागत नियमों के अनुरुप होती है। आदिम समाजो में सामान्यतः देखा गया है कि विकास की गति निम्न होती है, चूंकि वे आज भी प्रकृति से ज्यादा नजदीक परंपरात्मक रूप से जीवन-यापन करते आ रहे है। ये पूर्णतः प्रकृति द्वारा प्रदत्व सुविधाओं पर निर्भर रहते है तथा उस सीमित साधनो तक ही सीमित रहकर अपना जीवन यापन करते है। इनकी अर्थव्यवस्था बहुत ही सीधी, सरल एवं सीमित होती है, वे अपने क्षेत्र विशेष में ही ध्यान देते है वही से प्राप्त सुविधाओं में से अपना गुजारा बसर करते है ये आधुनिकता से पूर्णतः अनभिझ होते है तथा अपने अधिकतर कार्य श्रमशक्ति से ही करते है। परिणामस्वरुप इनका जीवन अत्यंत कठोर एवं संघर्षपूर्ण होता है। दूसरे शब्दों में अगर यह कहा जाये कि आदिम अर्थव्यवस्था प्रकृति द्वारा प्रदत्व वस्तुओं से संचालित है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। ये वर्तमान में भी मानव जीवन की उस प्रथम अवस्था को दर्शाते है जब मानव विज्ञान एवं विकास से कोसो दूर था इतना कठोर जीवन व्यतीत करने के पश्चात् भी यह समुदाय एक परिवार की भांति ही मिलकर रहता है चाहें वह वनोपज संग्रहण हो, मछली पकड़ना हो, शिकार करना हो या खेती करना, सभी कार्यों में जिस प्रकार एक परिवार में प्रत्येक सदस्य की भूमिका स्पष्ट रुप से होती है ठीक उसी प्रकार यह समुदाय मिलकर कार्य करते है। संक्षेप में हम कह सकते है कि अपनी इस उदारवादी छवि तथा प्राकृतिक पर्यावरण से घनिष्ठता इसके प्रकृति के प्रति निकटता का स्पष्ट प्रमाण है।
बंजारे et al. (Sun,) studied this question.