सामाजिक अभिप्रेरक जन्मजात नही बल्कि इन्हें व्यक्ति अपने जीवन काल में समाजीकरण की प्रकिया द्वारा सीखता है। सामाजिक अभिप्रेरक का कोई दैहिक आधार नहीं होता है। दूसरे शब्दों में यू कहें तो किसी भी व्यक्ति में सामाजिक अभिप्रेरक की शुरूआत किसी प्रकार की शारीरिक आवश्यक्ताओं से जैसे कि जैविक प्रेरक में होता है से नहीें होता है। यह नहीं कहा जा सकता है कि व्यक्ति में समूहन अभिप्रेरक की उत्पत्ति इसलिए हुई है क्योंकि इसमें अमूक शारीरिक आवश्यकता थी। हाँ, इन समाजिक अभिप्रेरकों का सम्बन्ध परिस्थिति या वातावरण से अवश्य होता है। कोई विशेष परिस्थिति के उत्पन्न हो जाने से व्यक्ति में सामाजिक अभिप्रेरक उत्पन्न हो जाता है। जैसे जब कोई व्यक्ति डर तथा असुरक्षा पैदा करने वाली परिस्थिति से घिर जाता है तो उसमें समूहन अभिप्रेरक तीव्र हो जाता है। सामाजिक अभिप्रेरक व्यक्ति को एक सफल सामाजिक जीवन व्यतीत करने में मदद करता है। सामाजिक अभिप्रेरक के अभाव में व्यक्ति जैविक रूप से जीवित तो रह सकता है परन्तु उसे सामाजिक रूप से सफल जीवन व्यतीत करने में कठिनाई होती है।
डॉ. सुभाष कुमार सुमन (Thu,) studied this question.