झारखंड का छोटानागपुर पठार भारतीय उपमहाद्वीप के उन विशिष्ट क्षेत्रों में सम्मिलित है जहाँ प्राकृतिक परिदृश्य, आदिवासी सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक आस्थाएँ तथा ऐतिहासिक अनुभव एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। उत्तरी एवं दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र, जिनमें रांची, रामगढ़, हजारीबाग, गुमला, सिमडेगा, खूंटी, गिरिडीह एवं लातेहार जैसे जिले सम्मिलित हैं, पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत संभावनाशील माने जाते हैं। हाल के वर्षों में परिवहन अवसंरचना के विकास, डिजिटल माध्यमों द्वारा प्रचार तथा राज्य सरकार की पर्यटन नीतियों के कारण इस क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालाँकि, पर्यटन के तीव्र विकास ने पर्यावरणीय क्षरण, जैव-विविधता पर दबाव, आदिवासी सांस्कृतिक परंपराओं के व्यवसायीकरण तथा स्थानीय समुदायों को सीमित लाभ जैसी समस्याओं को भी जन्म दिया है। इस संदर्भ में सतत पर्यटन की अवधारणा विशेष महत्व रखती है, जो आर्थिक विकास, सामाजिक समावेशन और पर्यावरणीय संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने पर बल देती है। यह शोध-लेख उत्तरी एवं दक्षिणी छोटानागपुर क्षेत्र में पर्यटन विकास के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं पारिस्थितिक आयामों का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किस प्रकार समुदाय-आधारित एवं सहभागी पर्यटन मॉडल अपनाकर आदिवासी संस्कृति के संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा तथा स्थानीय आजीविका के सशक्तिकरण को एक साथ सुनिश्चित किया जा सकता है। द्वितीयक स्रोतों एवं पूर्ववर्ती अध्ययनों के विश्लेषण के आधार पर यह लेख निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि सतत पर्यटन ही छोटानागपुर क्षेत्र में दीर्घकालिक और संतुलित विकास का सबसे प्रभावी मार्ग है।
अर्चना राणा (Mon,) studied this question.