नेपाल एक सुन्दर देश है जो हिमालय की गोद में बसा हुआ है। यह देश सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है। यहाँ विविध जात-जाति, भाषाभाषी, हिन्दू-बौद्ध-किरात सभी धर्म के लोग आपस में मिल कर रहते हैं। नेपाल को बहुजातीय, बहुभाषिक, बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक मुल्क कहा जाता है। नेपाल के जोसमनी संतों का साहित्य पर्याप्त है। जोसमनी सम्प्रदाय हिंसा और जाति कुल के भेदभाव के विरुद्ध ही समाज में अस्तित्व में आया है। जोसमनी सम्प्रदाय में मन, वचन और कर्म से अहिंसा पर जोर दिया जाता है। ईश्वरीय आराधना को सहज और सर्वस्वीकार बनाना, समाज के पुराने रूढीगत चिन्तन को दूर करना, निर्गुण अस्तित्व को ग्रहण करना, विभेद, भ्रष्टाचार, आडम्बर, जाति प्रथा आदि का यह मत प्रत्यक्ष विरोध करता है। प्रचलित धार्मिक विश्वास में जब रूढीवादी और अनैतिक विश्वास को स्थान मिलता है, तब समाज का एक जागरूक हिस्सा अलग धार्मिक चिन्तन की ओर उन्मुख हो जाना स्वाभाविक है, जोसमनि सम्प्रदाय इसी का प्रतिफल है। इस सम्प्रदाय के सन्तों की भाषा सधुक्कडी है क्योंकि ये घुमक्कड होते हैं। नेपाल में जोसमनी सन्तों का विपुल साहित्य है। नेपाली विद्वानों ने भी जोसमनी सन्तों से नेपाली भाषा में पर्याप्त योगदान पहुँचने की बात कही है। नेपाल का हिन्दी साहित्य का आरंभ जोशमनी सन्तों की वाणी से ही माना जाता है। जनकलाल शर्मा ने जोसमनी संतों के बारे में पर्याप्त खोज की हैं। प्रस्तुत लेख में जोसमनी संतों और उनके द्वारा साहित्य में किए गए योगदान के बारे में विश्लेषण करना ही इसका उद्देश्य है।
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Dilliram Sharma Sangraula
Hindu College of Pharmacy
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Dilliram Sharma Sangraula (Sun,) studied this question.
www.synapsesocial.com/papers/69fc2b158b49bacb8b34765c — DOI: https://doi.org/10.56975/ijnrd.v11i2.312381