आज का समय वैश्वीकरण का समय है, जिसने पूरी दुनिया को एक-दूसरे के बहुत पास ला दिया है। इसका प्रभाव केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि भाषा और साहित्य पर भी साफ दिखाई देता है। हिंदी अब केवल भारत तक सीमित भाषा नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रही है। पहले हिंदी साहित्य में गाँव, किसान और परंपराओं की झलक अधिक मिलती थी। अब रचनाओं में शहरों की ज़िंदगी, तकनीक और नई सोच दिखाई देने लगी है। अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग हिंदी में तेज़ी से बढ़ा है। इससे भाषा सरल और आधुनिक तो बनी, पर उसकी शुद्धता प्रभावित हुई है। आज “हिंग्लिश” हमारी आम बोलचाल और लेखन का हिस्सा बन गई है। वैश्वीकरण ने साहित्य के विषयों को भी बदल दिया है। अब उपभोक्तावाद, अकेलापन और पहचान का संकट साहित्य में उभरने लगे हैं। बाज़ारवाद के कारण बिकने वाली रचनाओं को अधिक महत्व मिलने लगा है। इससे गंभीर साहित्य के सामने नई चुनौती खड़ी हो गई है। मीडिया और विज्ञापन की भाषा ने हिंदी को अधिक आकर्षक बना दिया है। डिजिटल माध्यमों ने लेखकों को अपनी बात रखने का नया अवसर दिया है। सोशल मीडिया और ई-पत्रिकाओं से हिंदी का प्रसार तेज़ हुआ है। विदेशों में बसे लेखकों के अनुभव प्रवासी साहित्य के रूप में सामने आए हैं। इससे हिंदी साहित्य का अनुभव-क्षेत्र और गहरा हुआ है। शिक्षा में अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव से हिंदी की स्थिति कमजोर हुई है। फिर भी मातृभाषा के महत्व को लेकर नई जागरूकता भी देखने को मिल रही है। इस प्रकार वैश्वीकरण ने हिंदी भाषा और साहित्य दोनों को नए रूप में ढाल दिया है।
Prof. Dr. Syed Amin Syedbhai (Sun,) studied this question.
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