प्रस्तुत शोध सार में संगीत और सिनेमा अध्येता यतीन्द्र मिश्र के साहित्य में बदलती संस्कृति को समझने का प्रयास किया गया हैl हिंदी साहित्य के विभिन्न चरणों में साहित्य में आये परिवर्तन के माध्यम से यह देखा जा सकता हैl वर्तमान में समाज में बाजारवाद, पूंजीवाद और उपभोक्तावाद ने अपने पैर पसार लिए हैंl विश्व में होने वाली घटनाओं, हलचलों का प्रभाव देश पर और साहित्य पर पड़ता हैl वर्तमान में व्यक्ति स्वयं एक उत्पाद बन चुका है अर्थात या तो संवेदना का क्षरण हो गया है अथवा संवेदना को अति के स्तर तक प्रदर्शित करके अपना उल्लू सीधा करने की प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया है l यह प्रभाव साहित्य में कई स्वरूपों में दृष्टव्य हैl भारतीय संस्कृति में कलाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा हैl वे भी संस्कृति में आये परिवर्तनों को दर्शाती हैंl इन पर भी बाजारवाद और उपभोक्तावाद का प्रभाव पड़ा हैl यतीन्द्र मिश्र के रचनाकर्म में यह बात स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैl उनकी कविताओं में जहाँ समाज में मनुष्य में आई पूंजीवादी और उपभोक्तावादी प्रवृत्ति का चित्रण हुआ है, वहीं दूसरी ओर कलाओं पर विमर्श वर्तमान में आये परिवर्तन को समझने की दृष्टि प्रदान करता हैl संगीत कलाकारों से लिए गए साक्षात्कारों के माध्यम से कला के स्वरुप में बाजारवाद के परिणामस्वरूप आये परिवर्तन को समझा जा सकता है, गीतों के बोलों से लेकर संगीत के स्तर में आये परिवर्तनों ने कला के स्वरूप को प्रभावित किया है और इस प्रकार यतीन्द्र मिश्र के साहित्य संस्कृति में परिवर्तन को रेखांकित किया जा सकता हैl
Moondra et al. (Sun,) studied this question.
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