नाटक एक बहुआयामी दृश्य.श्रव्य कला हैए जिसमें भाषा और संवाद की केंद्रीय भूमिका होती है। रंगमंचीय प्रस्तुति में संवाद न केवल पात्रों के विचारों और भावनाओं का वाहक होता हैए बल्कि वह दर्शकों से एक गहन भावात्मक संबंध भी स्थापित करता है। यह शोधपत्र नाटकीय संवादों की योजना में भाषिक चेतना के महत्व को रेखांकित करता है। विभिन्न पात्रोंए उनकी सामाजिक स्थितिए संस्कारए वर्गए और मनोवैज्ञानिक संरचना के अनुसार भाषा के चयन को कैसे नाट्य संवादों में रूपायित किया जाएए यही इस शोध का केंद्रीय विषय है। यह शोध पत्र प्राचीन भारतीय नाट्य परंपरा से लेकर आधुनिक रंगमंच तकए संवादों में प्रयुक्त भाषाए संवाद की उपयुक्तताए मौन की सार्थकताए और संवादों की प्रभावशीलता को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत किया गया है। इसमें संस्कृत और प्राकृत जैसी भाषाओं के प्रयोगए संवादों की योजनाए पात्र अनुकूल भाषा विधानए और दृश्य सौंदर्य की दृष्टि से संवादों की महत्ता का गहन विश्लेषण किया गया है।
अंजना (Wed,) studied this question.