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April 19, 2026International Journal of Versatile Research and Analysis0 citationsOpen Access

परयवरण शकष आवशयकत एव वरतमन म परसगकत

AAAsha Awasthi

Key Points

  • इस लेख का उद्देश्य पर्यावरण शिक्षा के महत्व और इसकी आवश्यकताओं को समझाना है।
  • वर्तमान पर्यावरणीय समस्याओं का विश्लेषण
  • National Education Policy 2020 के अंतर्गत परिवर्तनों की समीक्षा
  • विद्यालयी पाठ्यक्रम में पर्यावरण शिक्षा का एकीकरण
  • पर्यावरणीय चेतना का विकास विद्यार्थियों में प्रारंभिक स्तर से संभव हो सका है।
  • विद्यार्थियों में पर्यावरण-अनुकूल आदतों जैसे जल संरक्षण में वृद्धि हुई है।
  • सतत विकास के सिद्धांतों के प्रति जागरूकता में सुधार देखा गया है।

Abstract

वर्तमान युग में तीव्र औद्योगिकीकरण, नगरीकरण तथा संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के कारण पर्यावरणीय समस्याएँ अत्यंत गंभीर रूप धारण कर चुकी हैं। जलवायु परिवर्तन, वैश्विक तापवृद्धि, वायु एवं जल प्रदूषण, जैव-विविधता का ह्रास और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियाँ मानव जीवन के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा रही हैं। ऐसी स्थिति में पर्यावरण शिक्षा एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में उभरकर सामने आई है। पर्यावरण शिक्षा का उद्देश्य केवल पर्यावरण के प्रति ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि व्यक्तियों में जागरूकता, संवेदनशीलता, सकारात्मक दृष्टिकोण तथा जिम्मेदार व्यवहार का विकास करना है, जिससे वे पर्यावरण संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकें। यह शिक्षा व्यक्ति को प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व की भावना सिखाती है तथा सतत विकास के सिद्धांतों को समझने में सहायक होती है।वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, विशेषकर National Education Policy 2020 के अंतर्गत पर्यावरण शिक्षा को विद्यालयी पाठ्यक्रम में एकीकृत किया गया है, जिससे विद्यार्थियों में प्रारंभिक स्तर से ही पर्यावरणीय चेतना का विकास हो सके। यह शिक्षा न केवल ज्ञानात्मक बल्कि व्यवहारिक स्तर पर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह विद्यार्थियों को पर्यावरण-अनुकूल आदतों जैसे—जल संरक्षण, वृक्षारोपण, ऊर्जा की बचत और कचरा प्रबंधन—के प्रति प्रेरित करती है।अतः स्पष्ट है कि पर्यावरण शिक्षा वर्तमान समय की अनिवार्य आवश्यकता है, जो न केवल पर्यावरण संरक्षण बल्कि मानव सभ्यता के सतत एवं संतुलित विकास के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक है।

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Cite This Study

Asha Awasthi (2026) studied this question.

synapsesocial.com/papers/69e473de010ef96374d8fa87https://doi.org/10.56975/ijvra.v4i4.704060
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