वैश्वीकरण 20वीं सदी के अंतिम दशकों से लेकर 21वीं सदी तक मानव जीवन के सभी क्षेत्रों को गहन रूप से प्रभावित करने वाली प्रक्रिया के रूप में उभरा है। अर्थव्यवस्था, विज्ञान, राजनीति, संस्कृति, संचार, तकनीक तथा शिक्षा के साथ-साथ भाषा और साहित्य भी इससे अछूते नहीं रहे। हिन्दी भाषा और साहित्य पर वैश्वीकरण का प्रभाव बहुआयामी है-एक ओर वैश्वीकरण ने हिन्दी की पहुँच को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार दिया है, वहीं दूसरी ओर भाषाई शुद्धता, सांस्कृतिक अस्मिता और साहित्यिक मूल्यों के सामने नई चुनौतियाँ भी रख दी हैं। प्रस्तुत शोध लेख में वैश्वीकरण के उदय, उसके प्रमुख घटकों, हिन्दी भाषा-साहित्य पर पड़े उसके रचनात्मक एवं विघटनकारी प्रभावों, प्रवासी साहित्य के उभार, डिजिटल संस्कृति के नए रूपों तथा भविष्य की संभावनाओं पर विस्तृत विवेचन किया गया है। अंत में उदारवादी तथा आलोचनात्मक दोनों दृष्टियों से हिन्दी भाषा-साहित्य पर वैश्वीकरण के परिणामों की समीक्षा प्रस्तुत की गई है।
Dr. Shila Mahadu Ghule (Sun,) studied this question.
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