भगवद्गीता भोजन को समझने के लिए एक अद्वितीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है, जिसे त्रिगुणों की संकल्पना के माध्यम से समझाया गया है – ये मूलभूत गुण हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं। ये केवल अमूर्त दार्शनिक विचार नहीं हैं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन के लिए व्यावहारिक साधन भी हैं। \कल्पना कीजिए कि प्रकृति एक रस्सी के समान है, जो तीन धागों से बुनी गई है। ये तीन धागे है \– सत्त्व (पवित्रता), रजस (उत्साह/क्रियाशीलता) और तमस (जड़ता/अंधकार) – मिलकर उस ताने-बाने को रचते हैं जिसे हम अनुभव करते हैं, यहाँ तक कि वह भोजन भी जिसे हम ग्रहण करते हैं। सत्त्व स्पष्टता, हल्केपन और सामंजस्य को लाता है। जब सत्त्व प्रमुख होता है, तो मन शांत और सतर्क रहता है, जैसे झील की स्थिर सतह जो आकाश को पूर्ण रूप से प्रतिबिंबित करती है।\रजस गति, इच्छा और क्रियाशीलता उत्पन्न करता है। यह उस हवा की तरह है जो झील को हिलाती है, जिससे लहरें और हलचल पैदा होती हैं। \तमस भारीपन, अंधकार और स्थिरता लाता है – जैसे झील के तल में जमा हुआ कीचड़, जो पानी को गंदला कर देता है।\
डॉ. दिवाकर पाल (Thu,) studied this question.