उपभोक्ता वर्ग आधुनिक समाज की सच्चाई के रूप में सामने आता है- जहाँ सुविधा, प्रदर्शन और बाज़ार तो है, पर स्थायी सुख और मानवीय संतोष का अभाव है। धीरेंद्र अस्थाना इस वर्ग की आलोचना करते हुए पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते हैं। आधुनिक समाज में उपभोक्ता वर्ग का उदय एक महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। उपभोक्ता वर्ग वह सामाजिक समूह है जो वस्तुओं और सेवाओं के उपभोग को जीवन का केंद्र मानता है। इस वर्ग की पहचान केवल आवश्यकताओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि सुविधाओं, सुख-साधनों और विलासिता के उपयोग से होने लगी है। वैश्वीकरण, उदारीकरण और तकनीकी विकास ने उपभोक्ता वर्ग को तेजी से बढ़ाया है। बाजार में वस्तुओं की भरमार, आकर्षक विज्ञापन ने लोगों को अधिक खरीदने के लिए प्रेरित किया है। आज व्यक्ति अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और पहचान को ब्रांड, मोबाइल, वाहन और जीवन-शैली से जोड़कर देखने लगा है। धीरेंद्र अस्थाना की यह कहानी बाजारवाद और मानवीय मूल्यों तथा नैतिकता का पतन जैसे गंभीर मुद्दों पर प्रकाश डालती हैं। उपभोक्तावादी संस्कृति में भौतिक वस्तुओं, सेवाओं का उपभोग जीवन का मुख्य लक्ष्य बन जाता है। व्यक्ति की पैसे कमाने की होड़ मानवीय रिश्तों को कमजोर बनाती हैं। धीरेंद्र अस्थाना का साहित्य उपभोक्ता संस्कृति के परिवेश में समकालीन जीवन की विसंगतियाँ, असंवेदनशीलता, शहरी मध्यमवर्गीय समाज की मानसिक एवं भावात्मक स्थितियाँआदि को यथार्थ के धरातल पर प्रभावी रूप से व्यक्त करता है । उनकी कहानियों में उपभोक्ता वर्ग केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि एक मानसिक और सांस्कृतिक स्थिति के रूप में उभरता है। उपभोक्ता वर्ग की सबसे बड़ी विशेषता है - दिखावे और सुविधाओं के माध्यम से पहचान बनाना। धीरेंद्र अस्थाना के पात्र अक्सर इसी मानसिकता से ग्रस्त दिखाई देते हैं। वे आधुनिक जीवन की चमक-दमक, नौकरी, शहरी जीवन और उपभोग की वस्तुओं में उलझे रहते हैं, पर भीतर से असंतुष्ट और अकेले होते हैं।
Dr. Tupe Sarla Suryabhan (Sun,) studied this question.