आज भूमंडलीकरण का युग हैi समाज में उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा हैi ऐसे में समूचा विश्व एक व्यापक बाजार का रूप ले चुका हैi समाज का प्रत्येक क्षेत्र आज बाजारवाद से प्रभावित हैi समाजवाद और साहित्य का अटूट संबंध तो पहले से ही अधोरेखित हुआ हैi ऐसे में हिंदी भाषा और साहित्य पर भी बाजारवाद का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही हैi हिंदी भाषा को आज विश्व बाजार में बहुत अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ हैi हिंदी के बल पर ही बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में अपने पैर जमा चुकी हैi हिंदी साहित्य भी आज व्यावसायिक दृष्टिकोन को ध्यान में रखकर लिखा जा रहाहैi कवि, लेखक, प्रकाशक तथा आलोचक भी अपने सिद्धांतों को अलग रखकर अर्थ प्राप्ति को ही अपना कवि कर्म मान रहे हैiच्यूँकि, आधुनिक काल की शुरुवात में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीजीने कवि कर्तव्य जैसे निबंध लिखकर उनके द्वारा तत्कालीन कवि एवं लेखकों को अपने कर्तव्यों के प्रति सजग किया थाi परंतु आज हिंदी साहित्य में इस प्रकार के मूल्य नहीं दिखायी दे रहें हैं, यह बड़े ही खेद का विषय हैi इससे यह स्पष्ट होता है कि, हिंदी भाषा तथा साहित्य पर बाजारवाद का गहरा प्रभाव हैi परंतु इससे एक ओर तो मूल्यों में गिरावट आती जा रही है, रिश्तों में दरार पड़ रही है, माननीय संबंध बिखरकर टूट रहें हैं, तो दुसरी ओर हिंदी भाषातथा साहित्य को भी विश्वस्तर पर विशेष महत्व मिल रहा हैi हिंदी विश्व बाजार की एक महत्वपूर्ण कड़ी बनती जा रही है और हिंदी साहित्य में भी प्रचूर मात्रा में परिवर्तन हो रहे हैंi साथ ही हिंदी भाषा तथा साहित्य का भी वैश्विक स्तरपर प्रचार- प्रसार बढ़ रहा है, इसमें दो राय नहींi
Dr. Dadasaheb Narayan Dange (Sun,) studied this question.
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