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विश्लेषण एसआईआर प्रक्रिया की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रभाव का अध्ययन करता है।
लोकतांत्रिक निर्वाचन प्रणाली में एक शुद्ध, सटीक एवं अपडेटेड मतदाता सूची लोकतांत्रिक वैधता की अनिवार्य शर्त है। इस हेतु भारत निर्वाचन आयोग द्वारा सामान्यतः निरंतर अद्यतन एवं आवधिक विशेष पुनरीक्षण के माध्यम से विद्यमान मतदाता सूचियों की सीमित जाँच के बाद समावेशन और निष्कासन की कार्रवाई की जाती है। इसके विपरीत गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में मौजूदा मतदाता सूची की संवीक्षा कर विद्यमान प्रविष्टियों को पुनः सत्यापित कर नए सिरे से मतदाता सूची तैयार होती है। लगभग दो दशक बाद ठीक विधानसभा चुनावों से पूर्व बिहार से शुरू हुए एसआईआर में प्रक्रियात्मक, वैधानिक, प्रशासनिक एवं राजनीतिक आरोपों और आपत्तियों से उभरे विवाद से देशव्यापी विमर्श खड़ा हुआ। इस शोध का उद्देश्य एसआईआर प्रक्रिया के औचित्य, निष्पक्षता और त्रुटिहीन होने, तकनीकी एवं प्रशासनिक सत्यापन प्रक्रियाओं का वैध मतदाताओं पर प्रभाव एवं नैसर्गिक न्याय एवं लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा की संभावना जैसे प्रश्नों से उत्पन्न संवैधानिक, प्रशासनिक एवं तकनीकी द्वंद्व का तथ्यपरक विश्लेषण करना तथा लोकतांत्रिक विश्वसनीयता एवं नागरिक अधिकारों के बीच संतुलित समाधान की संभावनाओं का अध्ययन करना है। इस अध्ययन में संवैधानिक प्रावधानों, निर्वाचन विधियों, न्यायालीय प्रेक्षणों एवं सुसंगत निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में एसआईआर प्रक्रिया को परीक्षित कर पक्ष-विपक्ष द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत दलीलों एवं मीडिया रिपोर्ट्स की विवेचना की गई है। प्रस्तुत शोध में निर्वाचक नामावली की तकनीकी एवं तार्किक त्रुटियों, जमीनी प्रशासनिक चुनौतियों एवं राजनीतिक विमर्श के साथ तथ्यपरक अध्ययन एवं न्यायिक दृष्टिकोण का समेकित विश्लेषण शामिल है। आलोच्य अध्ययन को बहुआयामी दृष्टिकोण से विधिक-विश्लेषण, वर्णनात्मक एवं आलोचनात्मक पद्धति से आकार दिया है। यह शोध-पत्र संकेत देता है कि तमाम कठिनाइयों और आरोपों के बावजूद मतदाता सूची के शुद्धिकरण हेतु गहन पुनरीक्षण की कार्रवाई स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव तथा लोकतान्त्रिक मताभिव्यक्ति के लिए अपरिहार्य है।
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DR RAJENDRA PRASAD AGARWAL (2026) studied this question.
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