शैलेश मटियानी (1931-2001)जी स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी के सबसे बड़े जनकथाकार हैं। हिन्दी कथा साहित्य के प्रथम प्रकाश स्तम्भ प्रेमचन्द के बाद द्वितीय कथा महारथी मटियानी जी हैं। शैलेश मटियानी ने दलित साहित्य के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।दबे कुचले, भूखे, नंगे, दलित, उपेक्षितों के जितने व्यापक संसार को आत्मीयता से मटियानी जी ने अपनी कहानियों में यथार्थ चित्रण किया है। मटियानी जी के पात्र उनके जिये-भोगे हैं अर्थात शैलेश जी ने गरीबों का भयंकर जीवन जिया है। शैलेश जी का जीवन अधिक कष्टदायक तथा संघर्षमय रहा है, जिसका असर उनकी रचनाओं तथा उनके साहित्य में देखने को मिलता है। उन्होंने स्वयं अपनी आंखों से दलित, असहाय,पीड़ित, समाज से वंचित लोगों तथा भीख मांगने वाले आदि का जीवन देखा है। शैलेश जी दलित वंचितों के प्रेमचन्द से भी बड़े हमदर्द व पैरोकार साबित होते हैं। शैलेश मटियानी हिंदी कथा-साहित्य में एक विलक्षण प्रतिभा रखने वाले रचनाकार हैं। उनकी “चील तथा अन्य कहानियाँ” कहानी संग्रह में शोध करना हिन्दी पाठकों के समक्ष नया दलित साहित्य प्रस्तुत करने के समान होगा क्योंकि हिंदी कथा साहित्य में उन्हें अभी तक उपेक्षित किया गया है । इन्हें वह स्थान प्राप्त नहीं है जो स्थान के हकदार है। ‘चील तथा अन्य कहानियों’ में उपस्थित दलित विमर्श के स्वरूप, सरोकार और संवेदनात्मक आयामों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
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निशु कुमारी
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निशु कुमारी (Thu,) studied this question.
www.synapsesocial.com/papers/69fed140b9154b0b828786e2 — DOI: https://doi.org/10.64388/irev9i11-1717347
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