प्रस्तुत शोधपत्र “विकसित भारत 2047” के परिप्रेक्ष्य में ग्रामीण भारत के रूपांतरण हेतु जिला प्रशासन की संस्थागत भूमिका का समालोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की राष्ट्रीय परिकल्पना में ग्रामीण विकास को केंद्रीय स्थान प्राप्त है, क्योंकि देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। अध्ययन में यह विश्लेषण किया गया है कि केंद्र और राज्य स्तर पर निर्मित नीतियों का जिला स्तर पर किस प्रकार क्रियान्वयन होता है तथा जिला प्रशासन किस सीमा तक एक प्रभावी “Implementation Unit” के रूप में कार्य कर पा रहा है। शोध में विश्लेषणात्मक एवं वर्णनात्मक पद्धति का उपयोग करते हुए द्वितीयक स्रोतों—सरकारी रिपोर्टों, नीति आयोग दस्तावेजों, पंचवर्षीय योजनाओं तथा संबंधित शोध अध्ययनों—का समालोचनात्मक परीक्षण किया गया है। अध्ययन सुशासन सिद्धांत, विकेंद्रीकरण सिद्धांत, सहभागी विकास मॉडल तथा न्यू पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन के सैद्धांतिक आधार पर निर्मित है। मुख्य निष्कर्षों से यह स्पष्ट होता है कि ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में नीति और व्यवहार के मध्य अंतर, लाभार्थी चयन की त्रुटियाँ, संस्थागत कमजोरी, संसाधनों की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप तथा समन्वय के अभाव जैसी चुनौतियाँ विद्यमान हैं। यद्यपि अनेक योजनाएँ—जैसे मनरेगा, प्रधानमंत्री आवास योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और डिजिटल पंचायत—ग्रामीण रूपांतरण की दिशा में प्रयासरत हैं, किंतु उनकी प्रभावशीलता जिला प्रशासन की क्षमता, पारदर्शिता और जनसहभागिता पर निर्भर करती है। अध्ययन यह प्रतिपादित करता है कि विकसित भारत 2047 की सफलता हेतु जिला प्रशासन को वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता, डिजिटल निगरानी तंत्र, सामाजिक अंकेक्षण तथा ग्राम स्तरीय सहभागिता के माध्यम से सुदृढ़ किया जाना आवश्यक है। अंततः यह शोध इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि विकसित भारत की परिकल्पना तभी साकार हो सकती है जब जिला प्रशासन परिवर्तनकारी नेतृत्व की भूमिका निभाते हुए ग्रामीण भारत में नीतियों का प्रभावी, पारदर्शी और सहभागी क्रियान्वयन सुनिश्चित करे।
चन्द्र प्रकाश गौतम (Mon,) studied this question.
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