वेदान्त 2.0 दर्शन एक अनुभव-आधारित दार्शनिक अनुसंधान है, जिसका मूल प्रश्न यह है कि मनुष्य अपने ही जीवन को सीधे देखना कब शुरू करता है। यह अध्ययन देह, मन, इच्छा, आकर्षण, प्रतिक्रिया और साक्षी के अनुभव को आत्म-बोध की दिशा में देखने का प्रयास करता है। इस शोध में “दो प्रवेश-द्वार, एक बोध” की अवधारणा प्रस्तुत की गई है, जिसमें देह और मन को बोध तक पहुँचने के दो अनुभवात्मक प्रवेश-बिंदुओं के रूप में देखा गया है। इसका मूल सूत्र है—“बाहर माध्यम है, भीतर अनुभव है” और “बाहर चिंगारी है, भीतर अग्नि है।” शोध-पद्धति प्रथम-पुरुष अनुभव-निरीक्षण पर आधारित है। इसमें किसी पूर्व निर्धारित आध्यात्मिक सिद्धि को स्वीकार करने के बजाय प्रत्यक्ष जीवन-अनुभव को पहली प्रयोगशाला माना गया है। क्रोध, इच्छा, आकर्षण, प्रेम, भय, अहंकार और प्रतिक्रिया जैसी घटनाओं को देखकर व्यक्ति अपने अनुभव की प्रक्रिया को समझने का प्रयास करता है। यह शोध किसी धर्म, दर्शन या गुरु का विरोध नहीं करता। इसका प्रस्ताव यह है कि दर्शन, शास्त्र, गुरु और साधना मार्गदर्शन दे सकते हैं, लेकिन अंतिम बोध व्यक्ति को अपने अनुभव में स्वयं देखना होता है। मुख्य सूत्र: “तुम्हें पढ़ना—दूसरे को नहीं, स्वयं को।”
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Vedanta2.0 Agyat Agyani (2026) studied this question.
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