भारत में महिला स्वास्थ्य: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, नीतियाँ और चुनौतियाँ डाॅ. शिवानी पाल महिला स्वास्थ्य, मानव विकास का एक केंद्रीय स्तंभ है, क्योंकि महिलाओं के स्वास्थ्य और सशक्तिकरण से पूरे समाज का स्वास्थ्य एवं सामाजिक–आर्थिक विकास प्रभावित होता है। भारत ने पिछले दशकों में अनेक नीतिगत सुधार और कार्यक्रम लागू किए हैं जिससे महिला स्वास्थ्य संबंधी प्रमुख संकेतकों में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। फिर भी भारत को मातृ मृत्यु दर (97 प्रति 1 लाख जनम), श्रमयोग्य आयु वर्ग की महिलाओं में उच्च एनीमिया (57%), किशोरी गर्भावस्था तथा यौन-प्रजनन स्वास्थ्य चुनौतियों, मानसिक स्वास्थ्य पर गहन प्रभाव, और स्वास्थ्य सेवाओं की असमान उपलब्धता जैसी चुनौतियों का सामना है। सतत विकास लक्ष्य (Sdg) में भी (जैसे SDG-3.1: MMR <70; SDG-3.7: सार्वभौमिक एसआरएचआर; SDG-5: लिंग समानता) भारत की प्रगति को रेखांकित किया गया है। आधुनिक सरकारी सर्वेक्षणों (जैसे NFHS-6) और वैश्विक स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, स्वास्थ्य-सेवाओं की पहुंच और गुणात्मकता में ग्रामीण-शहरी व आर्थिक/जातीय विभेद विद्यमान हैं। इस रिपोर्ट में इन मुद्दों को गहराई से समझने के लिए ऐतिहासिक संदर्भ, नीतिगत ढांचा, और तुलनात्मक अंतर्दृष्टि प्रदान की गई है। महिला स्वास्थ्य की अवधारणा : महिला स्वास्थ्य में सिर्फ रोग निवारण नहीं, बल्कि जीवनचक्र के हर चरण में शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक कल्याण शामिल है। इसमें गर्भावस्था एवं प्रसव-संबंधी स्वास्थ्य (मातृ स्वास्थ्य), प्रजनन स्वास्थ्य (जन्म नियंत्रण, यौन संक्रमण), किशोरी स्वास्थ्य (बाल-विवाह, किशोर गर्भधारण), मासिकधर्म स्वास्थ्य (सफाई, शिक्षा), पोषण (विशेषकर एनीमिया) और मानसिक स्वास्थ्य (उदासी, घरेलू हिंसा) के आयाम शामिल हैं। वृद्धावस्था में महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस, हृदयरोग एवं दीर्घकालीन नीडरोगों की संभावना बढ़ जाती है। महिला स्वास्थ्य को प्रभावी बनाए रखने के लिए शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण, सामाजिक सुरक्षा और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज जैसे सामाजिक-आर्थिक कारक अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्राचीन भारत में महिला स्वास्थ्य : प्राचीन भारत में आयुर्वेद व युनानी चिकित्सा पद्धतियों में महिला स्वास्थ्य की समृद्ध परम्पराएँ थीं। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता में गार्भाशय, प्रसवपूर्व देखभाल, स्तनपान और विभिन्न महिला रोगों का उल्लेख मिलता है। उस समय की सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में, वर्ण-व्यवस्था एवं पितृसत्ता के कारण महिलाएँ अपेक्षाकृत अल्प अधिकार एवं स्वतंत्रता वाली थीं, पर धार्मिक एवं आयुर्वेदिक ग्रंथों में मातृत्व व सु-स्वास्थ्य पर बल मिलता था। उदाहरण के लिए, चरक संहिता में गर्भधारण, प्रसव पूर्व एवं पश्चात देखभाल की विस्तृत सलाह मिलती है, जिससे ज्ञात होता है कि उस युग में भी प्रसव सुरक्षा को महत्व दिया गया था। तथापि, महिला शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधा सीमित थी और बाल विवाह जैसी प्रथाएँ भी विद्यमान थीं, जिससे युवती गर्भधारण की जटिलताएं बढ़ती थीं। मध्यकालीन भारत में महिला स्वास्थ्य : मध्यकालीन काल में भी आयुर्वेद, यूनानी व योग-नाड़ी तंत्र में महिला स्वास्थ्य के सिद्धांत विकसित होते रहे। तुर्की–मुगल शासनकाल में उच्च वर्ग में महिलाओं की सामाजिक स्थिति में कुछ परिवर्तन आए लेकिन आम ग्रामीण महिलाओं के स्वास्थ्य संसाधन पर प्रभाव सीमित रहा। वातानुकूलन व सार्वजनिक स्वच्छता के अभाव, असंतुलित आहार व शाकाहारी दृष्टिकोण से पोषण संबंधी कमियाँ बनी रहीं। साथ ही, सामन्ती एवं पितृसत्तात्मक माहौल में महिलाओं की शिक्षा तथा स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित थीं। प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेखित कई औषधीय जड़ी-बूटियाँ (जैसे हिरुदीनासव, लोहबासव) प्रजनन स्वास्थ्य के लिए उपयोग में लाए जाते थे। लेकिन इन व्यवस्थाओं का लाभ सामाजिक रूप से ऊँची जाति/वर्ग की महिलाओं तक सीमित था।
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डाॅ. शिवानी पाल (2026) studied this question.
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