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शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का विस्तार केवल शिक्षण की दक्षता का प्रश्न नहीं, बल्कि सार्वजनिक निर्णयाधिकार, विद्यार्थी के डेटा, शैक्षिक समानता और संस्थागत जवाबदेही का प्रश्न है। यह लेख बहुध्रुवीय विश्व में वैश्विक नैतिक मानकों, राष्ट्रीय विधिक व्यवस्थाओं और स्थानीय संस्थागत क्षमता के बीच पैदा होने वाली दूरी की पड़ताल करता है। यूनेस्को, ओईसीडी, यूरोपीय संघ और भारत के सार्वजनिक दस्तावेजों का तुलनात्मक दस्तावेजी विश्लेषण किया गया है। विश्लेषण दिखाता है कि मानक-घोषणाएँ और प्रभावी शिकायत-निवारण समानार्थी नहीं हैं; शिक्षा-विशिष्ट जोखिम-वर्गीकरण, स्वतंत्र परीक्षण, स्थानीय भाषा में गुणवत्ता और मानवीय पुनरीक्षण के बीच असंगति बनी रह सकती है। अध्ययन छह आयामों वाला एक शैक्षिक एआई नियामकीय जवाबदेही ढाँचा प्रस्तावित करता है। यह ढाँचा दस्तावेजी संकेतकों को वास्तविक कार्यान्वयन से अलग दर्ज करता है और बिना उपलब्ध आँकड़ों के देशों की कृत्रिम रैंकिंग से बचता है। योगदान एक परीक्षण योग्य नीति-मूल्यांकन रूपरेखा और भारतीय संस्थानों के लिए चरणबद्ध क्रियान्वयन प्रस्ताव है; यह कारणात्मक प्रभाव का अनुभवजन्य दावा नहीं करता।
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Professor (Dr.) Vikram Singh Aulakh (2026) studied this question.
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